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लिखूं तो क्या लिखूं कुछ समझ नहीं आ रहा।







लिखूं तो क्या लिखूं कुछ समझ नहीं आ रहा। कि लिखूं उस कलम के बारे में जो लोगों को न्याय देता है। कि लिखूं उस कलम के बारे में जो न्याय को छोड़कर अन्याय के लिए लिखता जा रहा है।


लिखूं तो क्या लिखूं कुछ समझ नहीं आ रहा। कि लिखूं उस उदार और उग्र के लिए। जो एक समाज को दिशा की ओर ले कर चले। कि लिखूं उस वामाचारी के लिए जो पतन की ओर ले जा रहे है।



लिखूं तो क्या लिखूं कुछ समझ नहीं आ रहा। कि लिखूं उस निति के लिए जो अनीतियों में लेकर जा रहा है। कि लिखूं उस दर्शन के लिए जो विडंबनाओं में ढाल रहे है।


लिखूं तो क्या लिखूं कुछ समझ नहीं आ रहा। कि लिखूं उस देश काल काल के बारे में जहाँ पर गंभीरता का समर आ रहा है। कि लिखूं उस वातावरण के बारे में जहाँ पर बर्बर पैरों को पसार रहा है।



लिखूं तो क्या लिखूं कुछ समझ नहीं आ रहा। कि लिखूं उस आशा की उस धारणा ले लिया जो अवधारणा में बदलता जा रहा है। कि लिखूं उस विचार के लिए जो जुगुप्सा में परिवर्तित होता जा रहा है।


लिखूं तो क्या लिखूं कुछ समझ नहीं आ रहा। कि लिखूं समाज के जर्जर के बारे में जिनसे दीमक की तरह बना लिया। कि लिखूं उस कुंठित विचार के बारे में जिसने समाज को परास्त कर दिया।



लिखूं तो क्या लिखूं कुछ समझ नहीं आ रहा है। कि लिखूं उस प्रतिमा के बारे मे जिसकी लोग आराधना करते है। कि लिखूं उस साधना के लिए जिसकी आड़ में राजनीति करते हैं।


लिखूं तो क्या लिखूं कुछ समझ नहीं आ रहा। कि लिखूं उस द्वंद्व के बारे में भी जो जब चाहे – जहाँ चाहे करवट बदल लेती है।


Introduction:

मेरा नाम इशाद शेख है। मैं टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोसिअल साइनस के एम- पॉवर ग्रंथालय अध्ययन केंद्र में प्रबंधक के रूप में कार्यरत हूँ। मैने हिंदी साहित्य में एम.ए किया है। मुझे कविता कहानी, कथा लिखने में रुचि है। ऊर्ज से जुड़े ने से विभिन्न क्षेत्रों के पहलुओं पर सोचने – विचारने, विचारों को प्रकट करने और साझा करने का अवसर प्राप्त हुआ।

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